गुजरात में सावन के पवित्र महीने के दौरान भगवान शिव के प्राचीन मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ रही है। इनमें खेड़ा जिले के कपड़वंज क्षेत्र के पास वातरक नदी के किनारे स्थित उत्कंठेश्वर महादेव मंदिर विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। अहमदाबाद से करीब 60 किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर को स्थानीय स्तर पर ‘उंटडिया महादेव’ के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह मंदिर करीब 2,000 वर्ष पुराना माना जाता है और गुजरात के प्रमुख प्राचीन शिव स्थलों में इसकी विशेष पहचान है।
मंदिर से जुड़ी धार्मिक मान्यता के अनुसार यहां मुनि जाबालि ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी। कहा जाता है कि शिवजी के दर्शन के बिना भोजन न करने के संकल्प के कारण उन्होंने भगवान शिव का आह्वान किया। उनकी गहरी साधना और भगवान के प्रति उत्कंठा से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए। इसी धार्मिक कथा के कारण इस स्थान का नाम उत्कंठेश्वर महादेव पड़ा।
मंदिर की सबसे खास विशेषताओं में यहां स्थापित शिवलिंग भी शामिल है। धार्मिक परंपरा के अनुसार शिवलिंग जमीन के ऊपर नहीं, बल्कि गर्भगृह में नीचे स्थित है। श्रद्धालुओं में यह मान्यता भी प्रचलित है कि शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल सीधे धरती के भीतर चला जाता है। इसी विशेषता के कारण भक्त इस मंदिर को गुजरात के काशी विश्वनाथ के रूप में भी श्रद्धा से देखते हैं।
सावन के दौरान यहां विशेष पूजा-अर्चना, जलाभिषेक, आरती और श्रृंगार किया जाता है। गुजरात के अलग-अलग क्षेत्रों से श्रद्धालु और कांवड़िये वातरक नदी से जल लेकर भगवान शिव को अर्पित करने पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में सुबह से ही धार्मिक गतिविधियां शुरू हो जाती हैं और शाम की आरती के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहते हैं।
मंदिर का प्राकृतिक वातावरण भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। वातरक नदी का किनारा, हरियाली और शांत वातावरण इसे धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ आध्यात्मिक यात्रा के लिए भी महत्वपूर्ण बनाता है। सावन के दौरान बढ़ती श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए मंदिर ट्रस्ट और स्थानीय प्रशासन की ओर से सुरक्षा और सुविधाओं की विशेष व्यवस्था की गई है।
