नई दिल्ली। ब्रिक्स देशों के बीच व्यापारिक लेनदेन में स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की मांग तेज हुई है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान सदस्य देशों ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था को अधिक संतुलित बनाने और अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में वैकल्पिक व्यवस्थाओं को मजबूत करने पर जोर दिया। इसी क्रम में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने का मुद्दा भी प्रमुखता से सामने आया।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने ब्रिक्स देशों के बीच राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार का विस्तार करने की आवश्यकता बताई। उनका कहना है कि इससे सदस्य देशों को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय दबाव और प्रतिबंधों के प्रभाव को कम करने में मदद मिल सकती है। स्थानीय मुद्राओं में सीधे लेनदेन बढ़ने से व्यापार के लिए प्रमुख वैश्विक मुद्राओं पर निर्भरता भी कम हो सकती है।
ब्रिक्स में भारत, चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका समेत कई उभरती अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। समूह के विस्तार के बाद इसका आर्थिक और वैश्विक प्रभाव भी बढ़ा है। ऐसे में सदस्य देशों के बीच व्यापार और वित्तीय सहयोग को मजबूत करने के प्रयासों को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
स्थानीय मुद्रा में व्यापार बढ़ाने के पीछे एक प्रमुख उद्देश्य लेनदेन की लागत और मुद्रा परिवर्तन से जुड़े जोखिम को कम करना भी है। यदि दो देशों के कारोबारी सीधे अपनी-अपनी मुद्राओं में भुगतान कर सकें, तो उन्हें हर लेनदेन में किसी तीसरी मुद्रा का सहारा लेने की जरूरत कम पड़ सकती है।
हालांकि, इस व्यवस्था को बड़े स्तर पर लागू करने के लिए कई चुनौतियां भी हैं। अलग-अलग देशों की मुद्राओं की विनिमय दर, वित्तीय बाजारों की गहराई और भुगतान प्रणालियों के बीच समन्वय जैसे मुद्दों का समाधान जरूरी होगा।
ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार का विस्तार वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में विविधता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। आने वाले समय में सदस्य देशों के बीच भुगतान प्रणालियों और वित्तीय सहयोग को मजबूत करने पर बातचीत आगे बढ़ने की उम्मीद है।
