नई दिल्ली। अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी की क्रीमी लेयर तय करने के मानदंड से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की याचिका पर सुनवाई के बाद अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। केंद्र ने अदालत से मार्च 2026 के उस फैसले को लागू करने के लिए अधिक समय देने और उसके प्रभाव को भविष्य में लागू करने से जुड़ा निर्देश देने का अनुरोध किया है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने की।
मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि ओबीसी क्रीमी लेयर की पहचान केवल माता-पिता की आय के आधार पर नहीं की जा सकती। अदालत ने विशेष रूप से उन मामलों पर विचार किया था, जिनमें सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और निजी क्षेत्र में काम करने वाले अभिभावकों के बच्चों को केवल वेतन आय के आधार पर ओबीसी आरक्षण से बाहर रखा गया था। अदालत ने कहा था कि क्रीमी लेयर निर्धारित करते समय केवल आय को आधार बनाना पर्याप्त नहीं है और अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों पर भी विचार किया जाना चाहिए।
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने दलील दी है कि फैसले को तत्काल या पिछली भर्तियों और दाखिलों पर लागू करने से प्रशासनिक जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। सरकार ने फैसले को लागू करने के लिए दो वर्ष या उससे अधिक का समय मांगा है। केंद्र के अनुसार, पुराने नियमों के आधार पर पूरी हो चुकी नियुक्तियों, पदोन्नतियों, वरिष्ठता और शैक्षणिक दाखिलों पर नए मानदंड का असर पड़ सकता है।
यह मामला संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा से भी जुड़ा है। अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की याचिका पर सुनवाई के लिए विशेष पीठ गठित करने का फैसला किया था। केंद्र ने 2025 की सिविल सेवा परीक्षा से जुड़े अभ्यर्थियों के संबंध में भी स्थिति स्पष्ट करने का अनुरोध किया था।
अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश से यह स्पष्ट होगा कि मार्च के फैसले को किस तरीके से और किस अवधि से लागू किया जाएगा। अदालत के अंतिम आदेश का असर ओबीसी आरक्षण के तहत चल रही तथा भविष्य की नियुक्तियों और कुछ पुराने मामलों पर पड़ सकता है। फिलहाल पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा है।
