Supreme Court of India ने हाल ही में धार्मिक मामलों से जुड़े मुकदमों की लगातार बढ़ती संख्या पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। अदालत ने कहा कि न्यायपालिका का कीमती समय उन मामलों में अधिक खर्च हो रहा है, जिनका संबंध धार्मिक विवादों, पूजा-पद्धति, धार्मिक परंपराओं और आस्था से जुड़ी याचिकाओं से है। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि क्या न्यायालयों का इतना अधिक समय केवल धार्मिक मुद्दों पर खर्च होना उचित है, जबकि देश में कई महत्वपूर्ण नागरिक और संवैधानिक मामले लंबित पड़े हैं।
सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत का मुख्य उद्देश्य संविधान और नागरिक अधिकारों की रक्षा करना है। ऐसे में केवल धार्मिक भावनाओं के आधार पर लगातार दायर होने वाली याचिकाएं न्याय व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव बना रही हैं। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि कई मामलों में राजनीतिक और सामाजिक हितों के कारण धार्मिक विवादों को न्यायालय तक पहुंचाया जाता है, जिससे लंबित मामलों की संख्या बढ़ती जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में देश में धार्मिक स्थलों, पूजा-अधिकार, त्योहारों, धार्मिक जुलूसों और परंपराओं से जुड़े मामलों में तेजी आई है। इन मामलों की वजह से अदालतों में लंबी सुनवाई होती है और अन्य जरूरी मामलों के निपटारे में देरी होती है। सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान सभी पक्षों से सामाजिक सौहार्द बनाए रखने और छोटे विवादों को आपसी संवाद से हल करने की अपील की।
कानूनी विशेषज्ञों ने अदालत की टिप्पणी को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि न्यायपालिका पर बढ़ते बोझ को कम करने के लिए वैकल्पिक विवाद समाधान प्रणाली को मजबूत करना जरूरी है। वहीं, राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने भी इस मुद्दे पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दी हैं। यह मामला अब देशभर में न्यायिक प्राथमिकताओं और धर्म से जुड़े विवादों पर नई बहस का विषय बन गया है।
