पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) की एक हालिया अध्ययन रिपोर्ट में राज्य में लगातार गिरते भूजल स्तर को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, यदि वर्तमान गति से भूजल का दोहन जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में कृषि, पेयजल आपूर्ति और पर्यावरण पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों ने सरकार, किसानों और आम नागरिकों से जल संरक्षण को प्राथमिकता देने तथा भूजल के सतत उपयोग के लिए प्रभावी कदम उठाने की अपील की है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि पंजाब के कई जिलों में भूजल स्तर हर वर्ष नीचे जा रहा है। इसका मुख्य कारण धान जैसी अधिक पानी की आवश्यकता वाली फसलों की बड़े पैमाने पर खेती, भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन और वर्षा जल का पर्याप्त संरक्षण न होना है। लगातार गिरते जलस्तर के कारण किसानों को सिंचाई के लिए अधिक गहराई तक बोरिंग करनी पड़ रही है, जिससे खेती की लागत भी बढ़ रही है।
पीएयू के वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि जल संकट से निपटने के लिए फसल विविधीकरण को बढ़ावा दिया जाए और धान के स्थान पर कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों की खेती को प्रोत्साहित किया जाए। इसके अलावा ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर सिंचाई और वर्षा जल संचयन जैसी आधुनिक तकनीकों को व्यापक स्तर पर अपनाने की आवश्यकता बताई गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन उपायों से भूजल पर बढ़ते दबाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी, बल्कि किसानों और आम नागरिकों की सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक है। जल संरक्षण को जन आंदोलन का रूप देकर ही भविष्य की जल आवश्यकताओं को सुरक्षित किया जा सकता है। विद्यालयों, पंचायतों और सामाजिक संगठनों के माध्यम से लोगों में जागरूकता बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो पंजाब को भविष्य में गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए जल संसाधनों के संरक्षण, वैज्ञानिक खेती और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता माना जा रहा है।
