तेहरान : अमेरिका के साथ चल रहे भारी तनाव और होर्मुज स्ट्रेट के आसपास की गई सख्त नाकेबंदी ने ईरान के लिए एक अभूतपूर्व संकट खड़ा कर दिया है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि ईरान के पास अब अपना कच्चा तेल (Crude Oil) स्टोर करने के लिए कोई जगह नहीं बची है। अमेरिकी नौसेना की सख्ती के कारण ईरानी तेल टैंकर फारस की खाड़ी से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि ईरान के सबसे बड़े तेल निर्यात केंद्र, खार्ग द्वीप पर कच्चे तेल का भारी जमावड़ा लग गया है। सैटेलाइट तस्वीरों ने एक सच उजागर किया है, जिसमें खार्ग द्वीप के आसपास समंदर में कई किलोमीटर तक सिर्फ कच्चा तेल फैला हुआ नजर आ रहा है। आशंका जताई जा रही है कि स्टोरेज क्षमता पूरी तरह फुल होने के बाद या तो तेल को सीधे समंदर में छोड़ा जा रहा है या फिर पुरानी पाइपलाइनों से भारी रिसाव हो रहा है।

उत्पादन रोकने पर कुओं के तबाह होने का बड़ा डर
एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान हर दिन 30 लाख बैरल से भी ज्यादा कच्चे तेल का उत्पादन करता है। इस अकूत उत्पादन का एक बहुत बड़ा हिस्सा अकेले खार्ग द्वीप के जरिए ही दुनिया भर में निर्यात किया जाता है। फिलहाल अमेरिकी नाकेबंदी के कारण टैंकर आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं, जिसके चलते ईरान ने पुराने जहाजों और फ्लोटिंग स्टोरेज टैंकरों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था। लेकिन अब वे टैंक भी लबालब भर चुके हैं। तेहरान के सामने इस वक्त सबसे बड़ी दुविधा यह है कि अगर वह मजबूरी में अपना तेल उत्पादन रोकता है, तो उसके कई अहम तेल कुओं को हमेशा के लिए भारी नुकसान पहुंच सकता है। ऐसे में उत्पादन को किसी तरह जारी रखने और इस अतिरिक्त तेल को ठिकाने लगाने की चुनौती लगातार विकराल होती जा रही है।
समंदर में 45 किलोमीटर तक फैला तेल का विशाल धब्बा
सैटेलाइट इमेजरी के जरिए जो तस्वीरें सामने आई हैं, वो पर्यावरण और समुद्री जीवन के लिहाज से बेहद डराने वाली हैं। खार्ग द्वीप के पास समंदर में लगभग 20 से 45 वर्ग किलोमीटर के विशाल दायरे में तेल का एक गहरा धब्बा देखा गया है। कुछ अनुमानों के अनुसार, हजारों बैरल कच्चा तेल पानी में मिल चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह खतरनाक रिसाव पुरानी पाइपलाइनों के फटने, स्टोरेज टैंकों पर बढ़ते क्षमता से अधिक दबाव या फिर युद्ध जैसी तनावपूर्ण स्थितियों का नतीजा हो सकता है। पर्यावरणविदों ने सख्त चेतावनी दी है कि अगर इस रिसाव को तुरंत नियंत्रित नहीं किया गया, तो फारस की खाड़ी के समुद्री जीवन, वहां के तटीय इलाकों और मछली उद्योग पर इसका बेहद विनाशकारी असर पड़ेगा।
वैश्विक बाजार में मची खलबली, भारत के लिए भी खतरे की घंटी
ईरान का यह तेल संकट अब पूरी दुनिया की धड़कनें बढ़ा रहा है। होर्मुज स्ट्रेट को दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापार मार्गों में गिना जाता है, जहां से वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 फीसदी हिस्सा रोजाना गुजरता है। ईरान और अमेरिका के बीच चल रही इस तनातनी ने वैश्विक तेल बाजार में भी भारी अस्थिरता पैदा कर दी है। दुनिया भर के देशों को अब इस बात का खौफ सता रहा है कि अगर यह समुद्री टकराव और गहराता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बेतहाशा उछाल देखने को मिल सकता है। भारत समेत कई एशियाई देशों के लिए यह स्थिति सीधे तौर पर चिंताजनक है, क्योंकि वे अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए पश्चिम एशिया से होने वाले तेल आयात पर ही बड़े पैमाने पर निर्भर हैं। तेल के दाम बढ़े तो इसका सीधा असर भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई पर देखने को मिलेगा।
