अमेरिका ने ईरान के खिलाफ आर्थिक दबाव बढ़ाते हुए नए प्रतिबंधों की घोषणा की है। अमेरिकी वित्त विभाग के अनुसार, यह कार्रवाई ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों, तेल व्यापार तथा उससे जुड़े वित्तीय नेटवर्क पर दबाव बढ़ाने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। नई कार्रवाई के तहत करीब 60 ईरान से जुड़ी संस्थाओं, व्यक्तियों और जहाजों को प्रतिबंधों की सूची में शामिल किया गया है। अमेरिकी प्रशासन ने इसे ईरान की अर्थव्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने की कोशिश बताया है।
अमेरिका ने विशेष रूप से ईरान के तेल निर्यात से जुड़े दलालों, वित्तीय मध्यस्थों और कथित ‘छाया बेड़े’ के पांच टैंकरों को निशाना बनाया है। इसके अलावा प्रौद्योगिकी, स्वर्ण, विमानन, जहाजरानी और डिजिटल संपत्तियों से जुड़े कारोबार पर भी प्रतिबंधों का दायरा बढ़ाया गया है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि इन माध्यमों से ईरान को मिलने वाली आर्थिक आय को सीमित करना प्रतिबंधों का प्रमुख उद्देश्य है।
अमेरिका ने ईरान के साथ व्यापार करने वाले दूसरे देशों को भी चेतावनी दी है। वाशिंगटन ने संकेत दिया है कि जो देश प्रतिबंधों के बावजूद ईरान के साथ महत्वपूर्ण आर्थिक संबंध बनाए रखते हैं, उन्हें आगे चलकर द्वितीयक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। चीन, संयुक्त अरब अमीरात, तुर्की और इराक जैसे ईरान के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों पर इस दबाव का विशेष असर पड़ सकता है।
इस कार्रवाई में भारत भी अप्रत्यक्ष रूप से चर्चा में आया है। अमेरिकी अधिकारियों ने ईरान के तेल और पेट्रोकेमिकल व्यापार से जुड़े चार भारत-आधारित कंपनियों तथा तीन भारतीय नागरिकों पर भी प्रतिबंध लगाए हैं। अमेरिकी पक्ष का आरोप है कि ये संस्थाएं ईरान से जुड़े व्यापारिक लेन-देन में शामिल थीं।
ईरान ने अमेरिकी कदम की कड़ी आलोचना करते हुए जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है। चीन ने भी एकतरफा अमेरिकी प्रतिबंधों का विरोध किया है और कहा है कि वह अपने वैध आर्थिक हितों की रक्षा करेगा।
नए प्रतिबंधों के बाद पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ने की आशंका है। विशेषज्ञों की नजर अब ईरान की प्रतिक्रिया, वैश्विक तेल आपूर्ति और अमेरिका के अगले कदम पर है।
