कर्ज की किस्तें नहीं चुकाने पर वाहन जब्त करने की प्रक्रिया को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने 17 सितंबर 2026 को अहम टिप्पणी की है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बैंक और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां कर्ज की वसूली के लिए बल प्रयोग करके किसी वाहन को अपने कब्जे में नहीं ले सकतीं। वाहन की जब्ती के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और भारतीय रिजर्व बैंक के दिशा-निर्देशों का पालन करना जरूरी है।
यह मामला एक ऐसे व्यक्ति की याचिका से जुड़ा था, जिसने वाणिज्यिक वाहन खरीदने के लिए चोलामंडलम इन्वेस्टमेंट एंड फाइनेंस कंपनी से ऋण लिया था। आरोप था कि ऋण की किस्तों को लेकर विवाद के दौरान उसके ट्रक को उचित सूचना दिए बिना जबरन ले लिया गया। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने की।
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि वित्तीय संस्थानों को ऋण की वसूली और गिरवी रखी संपत्ति पर अपने संविदात्मक अधिकारों का इस्तेमाल करने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार कानून से ऊपर नहीं है। यदि किसी वाहन को कब्जे में लेना जरूरी हो तो संबंधित संस्थान को निष्पक्ष प्रक्रिया और निर्धारित कानूनी उपायों का सहारा लेना होगा।
न्यायालय के सामने यह भी आया कि संबंधित मामले में वाहन जब्त करने से पहले सात दिन की आवश्यक सूचना नहीं दी गई थी। अदालत ने इस तरह की जबरन वसूली की कार्रवाई पर गंभीर आपत्ति जताई और इसे कानूनी प्रक्रिया के विपरीत माना। न्यायालय ने प्रभावित कर्जदार को मुआवजा देने का निर्देश भी दिया।
सर्वोच्च न्यायालय की इस टिप्पणी का महत्व उन लोगों के लिए भी है जिनके वाहन बैंक या वित्तीय कंपनियों से लिए गए ऋण के माध्यम से खरीदे गए हैं। अदालत ने संकेत दिया कि ऋण की वसूली के दौरान कर्जदार के अधिकारों और निर्धारित प्रक्रिया का सम्मान करना आवश्यक है। साथ ही भारतीय रिजर्व बैंक से संबंधित निष्पक्ष व्यवहार नियमों के वास्तविक पालन को सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।
