देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की प्रस्तावित व्यवस्था ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ को लेकर चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है। इस मुद्दे पर विचार कर रही संयुक्त संसदीय समिति लगातार विभिन्न पक्षों और विशेषज्ञों से बातचीत कर रही है। समिति के अध्यक्ष पी.पी. चौधरी ने कहा है कि यदि आवश्यक संवैधानिक संशोधन समय पर हो जाते हैं और राज्यों की सहमति मिलती है, तो 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ कुछ या कई राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की संभावना बन सकती है।
पी.पी. चौधरी के अनुसार, इस व्यवस्था के लिए संविधान में जरूरी बदलाव संसद से पारित होना महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राज्यों की भूमिका इसमें अहम होगी और किसी राज्य को जबरन अपनी विधानसभा का कार्यकाल समाप्त करने के लिए नहीं कहा जा सकता। यदि संबंधित राज्य की मंत्रिपरिषद और राजनीतिक नेतृत्व एक साथ चुनाव कराने पर सहमत होते हैं, तो संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार आगे बढ़ा जा सकता है।
समर्थकों का कहना है कि बार-बार चुनाव होने से सरकारी कर्मचारियों, शिक्षकों और पुलिस बल की बड़ी संख्या चुनावी ड्यूटी में लगती है। इससे प्रशासनिक कामकाज और विद्यार्थियों की पढ़ाई भी प्रभावित होती है। एक साथ चुनाव कराने से चुनावी खर्च और प्रशासनिक संसाधनों के उपयोग को कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है। समिति के अनुसार, इससे सरकारों को नीतियों और विकास योजनाओं पर अधिक समय देने का अवसर भी मिल सकता है।
हालांकि प्रस्ताव को लेकर विपक्ष की ओर से गंभीर आपत्तियां भी सामने आई हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने संयुक्त संसदीय समिति के सामने ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ की अवधारणा का विरोध करते हुए इसे असंवैधानिक बताया। उनका तर्क है कि अलग-अलग राज्यों की राजनीतिक और संवैधानिक परिस्थितियां अलग होती हैं और एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था संघीय ढांचे तथा लोकतांत्रिक जवाबदेही को प्रभावित कर सकती है।
संयुक्त संसदीय समिति ने देश के अलग-अलग हिस्सों में व्यापक विचार-विमर्श किया है। इसमें राजनीतिक दलों, विधि विशेषज्ञों, पूर्व न्यायाधीशों, शिक्षाविदों, सामाजिक संगठनों और अन्य हितधारकों की राय ली गई है। समिति की रिपोर्ट की समयसीमा भी बढ़ाई जा चुकी है और अब आगे की सिफारिशों पर ध्यान दिया जा रहा है।
फिलहाल ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ अंतिम निर्णय से दूर है। संवैधानिक संशोधन, राज्यों की सहमति और राजनीतिक सहमति इसके भविष्य को तय करने वाले प्रमुख मुद्दे होंगे।
