वर्तमान समय में दुनिया कई संघर्ष‑क्षेत्रों से जूझ रही है। इराक, अफ़ग़ानिस्तान, सोमालिया, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो, लेबनॉन, दक्षिण सूडान आदि में शांति बनाए रखने की कोशिशें जारी हैं। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र (U.N.) के peacekeeping मिशन (शांति रक्षक मिशन) अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन अब खबर है कि यू.एन. पूरे विश्व भर के peacekeeping मिशनों में लगभग 25% की कटौती करने जा रहा है।
यह लेख इस कटौती की वजहों, प्रभावों, भारत की भूमिका एवं चुनौतियों का विश्लेषण करेगा।
1. कटौती क्यों?
1.1 वित्तीय संकट (Funding Shortfall)
मुख्य कारण है अमेरिका द्वारा दी जाने वाली वित्तीय सहायता में कमी। अमेरिका यू.एन. peacekeeping बजट में सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में से है।
बजट की कमी से कर्मचारियों (peacekeepers), पुलिस, सैनिकों और उपकरणों की संख्या कम करनी पड़ी है। लगभग 13,000‑14,000 ऐसे सैनिक और पुलिस कर्मी होंगे जिन्हें फील्ड से वापस बुलाया जाएगा।
1.2 बढ़ती व्यय (Increasing Operational Costs) और बढ़ती अपेक्षाएँ
संघर्ष क्षेत्र अधिक जटिल हो चुके हैं, गैर‑राज्य अभिनेता, आतंकवादी संगठन, असममित युद्ध आदि शामिल हैं। इसलिए मिशनों को अधिक संसाधनों, आधुनिक उपकरणों और बेहतर प्रशिक्षण की ज़रूरत है।
कई peacekeeping मिशन ऐसे हैं जिनकी प्राथमिक भूमिका अब विवादित हो गई है, जैसे कि exit strategy की कमी।
1.3 नीति और प्राथमिकताएँ (Policy Shifts)
कुछ देशों की विदेश नीति में बदलाव हुआ है, विशेषकर अमेरिका की “America First” नीति के तहत UN‑funding एवं अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को संसाधन देने में अधिक सावधानी बरती जा रही है।
donor देशों की अपेक्षाएँ बढ़ गई हैं कि मिशन के mandate (आदेश) और संसाधन (resources) मिलान करें। यदि मिशन के लिए पर्याप्त बजट ना हो, तो उसकी प्रभावशीलता कम होगी।
2. कौन‑से मिशन प्रभावित होंगे?
वर्तमान में लगभग नौ सक्रिय मिशन हैं जिनमें कटौती की योजना है। इनमें शामिल हैं:
साउथ सूडान (South Sudan)
डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो (DRC)
लेबनॉन (Lebanon)
साइप्रस, कोसोवो, सेंट्रल अफ़्रीकन रिपब्लिक आदि भी प्रभावित होंगे।
3. भारत की भूमिका और प्रतिक्रियाएँ
3.1 भारत के विचार
भारत ने U.N. peacekeeping सुधारों की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है — विशेषकर troop‑contributing देशों को मिशन mandate बनाने की प्रक्रिया में शामिल करना, जितना संसाधन मिशन को चाहिए हो, वह दिलवाना।
exit strategy की बात भारत ने कई बार उठायी है। मिशन शुरू से ही यह तय होना चाहिए कि कब और कैसे वह समाप्त होगा।
3.2 भारत की शांति रक्षक उपलब्धियाँ
भारत दुनिया के उन देशों में से है जिसने peacekeeping मिशनों में लंबे समय से योगदान दिया है। लाखों सैनिकों‑पुलिसकर्मियों ने विभिन्न मिशनों में हिस्सा लिया है।
महिला peacekeepers की भागीदारी बढ़ाने, बेहतर तकनीकी उपकरणों का उपयोग आदि क्षेत्रों में भारत सक्रिय है।
4. कटौती का प्रभाव
4.1 शांति, सुरक्षा और संघर्ष वाले क्षेत्र
यदि peacekeeping मिशन कम हो जाएँ, तो संघर्ष‑क्षेत्रों में नागरिकों को सुरक्षा मिलना कठिन हो सकता है।
शांति बनाए रखने, मानवाधिकारों की रक्षा, संघर्ष क्षेत्रों में मध्यस्थता आदि क्षमताएँ प्रभावित होंगी।
4.2 मिशन कर्मचारियों और योगदान देने वाले देशों पर प्रभाव
सैनिक और पुलिस कर्मियों की संख्या में कटौती, छुट्टियाँ, उपकरणों की कमी आदि।
troop‑contributing देशों (जिन देशों से सैनिक भेजे जाते हैं) को सुरक्षा कवच और संसाधनों की कमी से चुनौतियाँ होंगी।
4.3 संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता और क्षमता
यदि UN लगातार संसाधन संकट, बजट कमी व समर्थकों के दबावों के कारण कटौती करता रहा, तो उसकी क्षमता और विश्वास कम हो सकता है।
मिशन के आदेश (mandate) और उपलब्ध संसाधनों के बीच अंतर (mandate‑resource mismatch) से मिशन की प्रभावशीलता कम होना निश्चित है।
5. संभावित समाधान और भविष्य की राह
5.1 निधि (Fund) और संसाधन सुनिश्चित करना
donor देशों को समय रहते अपने योगदान सुनिश्चित करने चाहिए।
UN‑budgeting प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और जिम्मेदार होनी चाहिए।
5.2 मिशन संरचना में सुधार (Reform)
मिशन mandate को यथार्थपरक बनाना चाहिए — लक्ष्य, समयसीमा, संसाधन आदि का सही निर्धारण।
exit strategy मिशनों की शुरुआत में ही तय होनी चाहिए।
5.3 तकनीकी और परिचालन नवाचार
आधुनिक तकनीक (ड्रोन, surveillance systems, बेहतर सूचना एवं कम्युनिकेशन) का इस्तेमाल।
peacekeepers की सुरक्षा सुनिश्चित करना (उच्च जोखिम‑क्षेत्रों में सुरक्षा उपाय)।
5.4 भारत और अन्य विकासशील देशों की भागीदारी
भारत जैसे troop‑contributing देशों को अधिक सक्रिय रोल देना चाहिए peacekeeping नीति‑निर्माण (policy making) एवं resource planning में।
महिला सैनिकों और पुलिसकर्मियों की भागीदारी बढ़ाना।
निष्कर्ष
U.N. peacekeeping cuts 2025 एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यह सीधा संकेत है कि विश्व समुदाय को शांति, सुरक्षा और संघर्ष प्रबंधन के मौजूदा मॉडल पर पुनर्विचार करना होगा। यदि ये कटौती नहीं संभाली गईं, तो उन देशों और लोगों पर बुरा असर होगा जो संघर्ष की जद में हैं। लेकिन इस संकट को एक अवसर भी माना जा सकता है — सुधारों, पारदर्शिता और साझा ज़िम्मेदारी की दिशा में।

1. कटौती क्यों?