सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायिक मंचों के लिए किसी धार्मिक संप्रदाय की आवश्यक प्रथाओं को परिभाषित करना बेहद मुश्किल है। संविधान पीठ ने सबरीमाला मामले और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की।
संविधान के तहत किसी धर्म की धार्मिक प्रथा को तभी तक संरक्षण प्राप्त है, जब तक कि वह नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था और स्वास्थ्य के विरुद्ध न हो।सबरीमाला मंदिर समेत धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और विभिन्न धर्मों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और सीमा से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई के सातवें दिन प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की संविधान पीठ ने कहा कि संविधान में ‘आवश्यक’ शब्द का कोई उल्लेख नहीं है।

