भारत की अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून के दौरान 7.8 प्रतिशत की वास्तविक वृद्धि दर्ज की है। यह आंकड़ा अर्थशास्त्रियों के अनुमान और भारतीय रिजर्व बैंक के करीब 7 प्रतिशत के अनुमान से अधिक रहा। विनिर्माण और निजी निवेश में मजबूती को इस तेज वृद्धि के प्रमुख कारणों में गिना जा रहा है। हालांकि, आंकड़े जारी होने के बाद इनकी गणना और विश्वसनीयता को लेकर आर्थिक विशेषज्ञों तथा विपक्ष की ओर से सवाल भी उठाए गए हैं।
विवाद की मुख्य वजह सकल घरेलू उत्पाद की गणना के लिए अपनाई गई नई पद्धति और पिछले वर्ष के आंकड़ों में किए गए संशोधन हैं। सरकार ने हाल ही में सकल घरेलू उत्पाद की नई श्रृंखला जारी की है, जिसमें आधार वर्ष को 2011-12 से बदलकर 2022-23 किया गया है। इसके अलावा कीमतों के आकलन में अधिक विस्तृत आंकड़ों और दोहरी अपस्फीति पद्धति का इस्तेमाल किया गया है।
पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग सहित कुछ विशेषज्ञों ने पुराने और नए आंकड़ों की तुलना करते हुए सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि पिछले वर्ष के तुलनात्मक आंकड़ों में कमी किए जाने से मौजूदा वृद्धि दर काफी ऊंची दिखाई दे रही है। इसी आधार पर उन्होंने वास्तविक वृद्धि को 7.8 प्रतिशत से काफी कम बताया है। हालांकि सरकार ने इस दावे को गलत बताते हुए कहा है कि नई गणना बेहतर आंकड़ों और आधुनिक सांख्यिकीय पद्धतियों पर आधारित है।
सरकार के पक्ष में यह तथ्य भी है कि विनिर्माण क्षेत्र में 9.2 प्रतिशत और निजी निवेश में करीब 12 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है। इससे संकेत मिलता है कि आर्थिक गतिविधियों में वास्तविक मजबूती भी मौजूद है।
अब बहस केवल 7.8 प्रतिशत के आंकड़े पर नहीं, बल्कि रोजगार, आय, निवेश और आम लोगों की आर्थिक स्थिति में इस वृद्धि के प्रभाव पर भी केंद्रित है।
