नई दिल्ली। न्याय की तलाश में अक्सर लोग भावुकता और जल्दबाजी में सीधे उच्च न्यायालयों का दरवाजा खटखटाते हैं, विशेषकर जब पुलिस प्राथमिकी दर्ज करने में आनाकानी करे। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि न्याय की सीढि़यां लांघी नहीं जा सकतीं।

इसने कहा कि यदि पुलिस एफआइआर दर्ज नहीं करती, तो सीधे उच्च न्यायालय जाने के बजाय नागरिक को पहले कानून द्वारा निर्धारित वैकल्पिक कानूनी रास्तों का पालन करना अनिवार्य है।
असाधारण अधिकार क्षेत्र का विवेकपूर्ण उपयोग न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति आगस्टीन जार्ज मसीह की पीठ ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 की व्याख्या करते हुए कहा कि उच्च न्यायालयों के पास रिट जारी करने की शक्ति व्यापक तो है, लेकिन यह ‘असाधारण’ और ‘विवेकाधीन’ है।
